मोतियाबिंद को समझें: लक्षण, प्रकार, ऑपरेशन और सही लेंस का चुनाव
मोतियाबिंद क्या है, किन लक्षणों पर ध्यान दें, ऑपरेशन ही इसका इलाज क्यों है, ऑपरेशन कैसे होता है, कौन सा लेंस चुनें, और खर्च का मुफ़्त अनुमान कैसे पाएं।
यह अंग्रेज़ी में लिखे गए एक लेख का अनुवाद है। अगर यहां कोई बात अलग लगे, तो अंग्रेज़ी संस्करण को ही सही माना जाए।
जिन लोगों को बताया जाता है कि उन्हें मोतियाबिंद है, उनमें से ज़्यादातर के मन में एक साथ दो बातें आती हैं: आंख के ऑपरेशन की चिंता, और आगे क्या होगा इसकी उलझन। कौन सा लेंस? कौन सा अस्पताल? एक ही ऑपरेशन के दाम अलग-अलग जगह इतने अलग क्यों होते हैं?
यह गाइड बताती है कि मोतियाबिंद क्या है, यह आपकी नज़र को कैसे बदलता है, ऑपरेशन कब करवाना ठीक रहता है, ऑपरेशन कैसे होता है, और आंख में लगने वाला लेंस कैसे चुनें। अगर आप जानना चाहते हैं कि आपका कितना खर्च हो सकता है, तो आख़िर में मुफ़्त अनुमान के लिए एक छोटा-सा फ़ॉर्म है।
मोतियाबिंद क्या है
आंख के रंगीन हिस्से, जिसे आइरिस कहते हैं, उसके पीछे एक छोटा, साफ़ लेंस होता है, लगभग 9 से 10 मिलीमीटर चौड़ा। इसका काम रोशनी को आंख के पिछले हिस्से में मौजूद रेटिना (आंख का पर्दा) पर फ़ोकस करना है, ठीक वैसे ही जैसे कैमरे का लेंस फ़िल्म पर फ़ोकस करता है। मोतियाबिंद का मतलब है इसी लेंस का धुंधला हो जाना।
स्वस्थ आंखसाफ़ लेंस रोशनी को रेटिना पर एक तीखे बिंदु पर लाता है।
मोतियाबिंद वाली आंखधुंधला लेंस रोशनी को बिखेर देता है, इसलिए छवि धुंधली और फीकी हो जाती है।
लेंस प्रोटीन से बना होता है, जो एक सटीक और पारदर्शी क्रम में जमे होते हैं। उम्र के साथ, और कुछ बीमारियों में और जल्दी, ये प्रोटीन आपस में चिपककर गुच्छे बना लेते हैं। ये गुच्छे रोशनी को आर-पार जाने देने के बजाय बिखेर देते हैं, और लेंस धीरे-धीरे धुंधला और अक्सर पीला-भूरा हो जाता है। यह कोई गांठ नहीं है, और न ही आंख पर जमी कोई परत है जिसे खुरचकर या धोकर हटाया जा सके।
ज़्यादातर मोतियाबिंद उम्र के साथ होते हैं और सालों में धीरे-धीरे बढ़ते हैं। 2015 से 2019 के बीच हुए राष्ट्रीय अंधता एवं दृष्टि क्षीणता सर्वेक्षण (National Blindness and Visual Impairment Survey) के अनुसार, भारत में 50 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों में अंधेपन का सबसे आम कारण बिना इलाज वाला मोतियाबिंद है। साथ ही, इसका इलाज सबसे अच्छी तरह हो सकता है: इसे ठीक करने वाला ऑपरेशन देश में सबसे ज़्यादा किए जाने वाले ऑपरेशनों में से एक है।
किन लक्षणों पर ध्यान दें
मोतियाबिंद आम तौर पर इतनी धीरे-धीरे बढ़ता है कि लोग बिना जाने उसके आदी हो जाते हैं। अक्सर घरवाले पहले भांप लेते हैं: बात टीवी की आवाज़ की नहीं होती, बात होती है टीवी के पास खिसककर बैठने की। आम लक्षण:
- धुंधला या धूमिल दिखना, जैसे किसी मैले शीशे के पार देख रहे हों, और चश्मा साफ़ करने से भी फ़र्क न पड़े।
- रंग फीके या पीले-से दिखना। सफ़ेद रंग क्रीम जैसा लगता है, और नीले और बैंगनी रंग में फ़र्क करना मुश्किल हो जाता है।
- चकाचौंध और रोशनी के चारों ओर घेरे। धूप चुभती हुई लगती है, और रात में सामने से आती गाड़ियों की हेडलाइट और स्ट्रीट लाइटें तारों जैसी फैली किरणों में बिखर जाती हैं।
- कम रोशनी में ठीक से न दिखना, और पढ़ने के लिए ज़्यादा रोशनी की ज़रूरत पड़ना।
- चश्मे का नंबर बार-बार बदलना, ख़ासकर दूर की नज़र का और कमज़ोर होते जाना।
- अचानक बिना चश्मे के पढ़ना आसान हो जाना। कुछ मोतियाबिंद कुछ समय के लिए आंख का फ़ोकस बदल देते हैं, इसलिए थोड़े दिन पढ़ना बेहतर हो जाता है। लोग इसे नज़र का लौट आना या ‘सेकंड साइट’ कहते हैं। यह टिकता नहीं है।
- एक आंख में एक चीज़ दो दिखना, जो उस आंख को ढकने पर ठीक हो जाता है।
साफ़ लेंसतीखे अक्षर और असली रंग।
मोतियाबिंद के साथअक्षर धुंधले हो जाते हैं, गहरे और हल्के का फ़र्क घट जाता है, रंग फीके और पीले-से हो जाते हैं।
रात मेंरोशनियां चकाचौंध और घेरों में फैल जाती हैं, जिससे रात में गाड़ी चलाना मुश्किल हो जाता है।
इनमें से कोई भी लक्षण सिर्फ़ मोतियाबिंद का नहीं है। ग्लूकोमा (काला मोतिया), डायबिटीज़ से होने वाली आंख की बीमारी और रेटिना की समस्याओं में भी नज़र धुंधली हो सकती है, और इनमें से कुछ का इलाज जल्दी करना ज़रूरी होता है। इसीलिए नज़र में कोई भी बदलाव हो, तो अंदाज़ा लगाने के बजाय आंखों की जांच करवाएं।
मोतियाबिंद किसे होता है
सबसे बड़ा कारण उम्र है, और साठ या सत्तर साल की उम्र तक ज़्यादातर लोगों के लेंस में कुछ न कुछ धुंधलापन आ जाता है। कुछ बातें मोतियाबिंद को जल्दी ले आती हैं या उसे तेज़ी से बढ़ाती हैं:
- डायबिटीज़ (शुगर)
- धूम्रपान
- लंबे समय तक स्टेरॉयड की गोलियां या स्टेरॉयड वाली आई ड्रॉप लेना
- सालों तक बिना बचाव के बहुत ज़्यादा तेज़ धूप में रहना
- आंख में चोट, या पहले हुआ आंख का कोई ऑपरेशन
- परिवार में कम उम्र में मोतियाबिंद होने का इतिहास
बच्चे भी मोतियाबिंद के साथ पैदा हो सकते हैं या कम उम्र में उन्हें मोतियाबिंद हो सकता है। वह एक अलग स्थिति है, जिसमें तुरंत आंखों के विशेषज्ञ को दिखाना ज़रूरी है, क्योंकि बच्चे की नज़र अभी विकसित हो रही होती है। यह गाइड उसके बारे में नहीं है।
तीन आम प्रकार
आंखों के डॉक्टर मोतियाबिंद का प्रकार इस आधार पर बताते हैं कि लेंस के किस हिस्से में धुंधलापन है। ये शब्द आपको अपनी रिपोर्ट पर दिख सकते हैं।
न्यूक्लियर (Nuclear)लेंस का बीच का हिस्सा सख़्त और पीला हो जाता है। उम्र से जुड़ा सबसे आम प्रकार। पहले दूर की नज़र धुंधली होती है, और कुछ समय के लिए पढ़ना बेहतर हो सकता है।
कॉर्टिकल (Cortical)लेंस के किनारे से अंदर की ओर तिकोनी धारियां आती हैं, जैसे पहिये की तीलियां। अक्सर पहली शिकायत रोशनी से होने वाली चकाचौंध की होती है।
पोस्टीरियर सबकैप्सुलर (Posterior subcapsular)लेंस के पिछले हिस्से में, ठीक रोशनी के रास्ते में, एक धब्बा बन जाता है। यह तेज़ी से बढ़ सकता है और डायबिटीज़ वालों और स्टेरॉयड लेने वालों में ज़्यादा होता है। पढ़ने और तेज़ रोशनी में दिक्कत होती है।
क्या अभी ऑपरेशन ज़रूरी है?
हमेशा नहीं। छोटा मोतियाबिंद, जिससे आपको परेशानी नहीं हो रही, उस पर नज़र रखी जा सकती है, लगभग हर साल एक बार जांच करवाते हुए। इस बीच चश्मे का नया नंबर, पढ़ने के लिए तेज़ रोशनी और एंटी-ग्लेयर लेंस कुछ समय तक आपको आराम दे सकते हैं।
ऑपरेशन तब ठीक रहता है जब मोतियाबिंद आपकी ज़िंदगी में रुकावट बनने लगे: पढ़ना, चेहरे पहचानना, काम करना, खाना बनाना, सुरक्षित रूप से सीढ़ियां चढ़ना या गाड़ी चलाना। यह फ़ैसला आप अपने आंखों के डॉक्टर के साथ मिलकर लेते हैं, और फ़ैसला लेने से पहले कुछ बातें जान लेना अच्छा है।
- मोतियाबिंद की कोई दवा नहीं है। कोई ड्रॉप या गोली इसे घोल नहीं सकती, चाहे उसका विज्ञापन कैसे भी किया जाए। ऑपरेशन ही एकमात्र इलाज है।
- इसके “पकने” का इंतज़ार न करें। यह सलाह पुराने तरीकों के ज़माने की है। बहुत बढ़े हुए मोतियाबिंद को निकालना ज़्यादा मुश्किल होता है, ऑपरेशन में ज़्यादा समय लगता है और ठीक होने में भी देर लगती है, और इससे आंख के अंदर का दबाव भी बढ़ सकता है।
- पहले आंख की दूसरी समस्याओं की जांच होती है। अगर रेटिना या ऑप्टिक नर्व (आंख की नस) पर भी असर है, तो सर्जन आपको बताएंगे कि आपकी नज़र कितनी बेहतर होने की उम्मीद की जा सकती है।
- ऑपरेशन से पहले डायबिटीज़ और ब्लड प्रेशर काबू में होने चाहिए। अस्पताल दोनों की जांच करता है।
ऑपरेशन कैसे होता है
मोतियाबिंद के ऑपरेशन में धुंधले प्राकृतिक लेंस की जगह एक साफ़ कृत्रिम लेंस लगाया जाता है, जिसे इंट्राऑक्युलर लेंस या IOL कहते हैं। आम तौर पर यह डे-केयर में होता है: आप आते हैं, तैयारी होती है, ऑपरेशन होता है, और आप उसी दिन घर चले जाते हैं। आंख को ड्रॉप से या आंख के आसपास एक छोटे इंजेक्शन से सुन्न किया जाता है, और आप जागते रहते हैं। ज़्यादातर लोगों को दर्द नहीं होता, बल्कि दबाव महसूस होता है और तेज़ रोशनी दिखती है।
1. एक छोटा-सा चीरासर्जन कॉर्निया के किनारे पर एक बहुत छोटा चीरा लगाते हैं, आम तौर पर 2 से 3 मिलीमीटर चौड़ा।
2. धुंधला लेंस बाहर निकलता हैएक पतला प्रोब अल्ट्रासाउंड से लेंस को छोटे टुकड़ों में तोड़ता है और धीरे से उन्हें खींचकर बाहर निकाल लेता है।
3. मुड़ा हुआ लेंस अंदर जाता हैनया लेंस मुलायम होता है और मोड़कर डाला जाता है, इसलिए यह उसी छोटे चीरे से अंदर चला जाता है।
4. यह अपनी जगह पर खुल जाता हैयह उसी कैप्सूल (थैली) में खुल जाता है जहां पुराना लेंस था। चीरा आम तौर पर बिना टांकों के अपने आप बंद हो जाता है।
तीन तरीकों के बारे में आप सुन सकते हैं।
- फ़ेकोइमल्सीफ़िकेशन, यानी फ़ेको (phaco), ऊपर दिखाया गया तरीका है, जो बहुत छोटे चीरे से होता है। ज़्यादातर निजी आंख अस्पताल यही तरीका अपनाते हैं।
- मैनुअल स्मॉल-इंसीज़न कैटरेक्ट सर्जरी, यानी SICS, में लेंस को थोड़े बड़े, सुरंग जैसे चीरे से एक ही टुकड़े में निकाला जाता है, आम तौर पर बिना टांकों के। यह एक बेहतरीन ऑपरेशन है, सख़्त और बहुत बढ़े हुए मोतियाबिंद में अच्छा काम करता है और इसका खर्च कम होता है। भारत के कई धर्मार्थ अस्पताल, जहां बहुत बड़ी संख्या में ऑपरेशन होते हैं, इसी पर भरोसा करते हैं।
- लेज़र की मदद से होने वाली सर्जरी में शुरुआती कुछ चरणों के लिए फ़ेम्टोसेकंड लेज़र का इस्तेमाल होता है। इससे खर्च बढ़ जाता है, और ज़्यादातर आंखों में नतीजा फ़ेको जैसा ही रहता है।
आपकी आंख के लिए कौन सा तरीका ठीक है, यह आपके सर्जन सुझाते हैं। यह पहले इलाज का फ़ैसला है, और दाम का फ़ैसला उसके बाद।
लेंस का चुनाव
यही वह फ़ैसला है जिससे बाद में आपके चश्मे की ज़रूरत बदलती है, और दो जगह बताए गए दाम में फ़र्क की सबसे बड़ी वजह भी यही है। लेंस की पावर ऑपरेशन से पहले लिए गए माप से आपकी आंख के हिसाब से निकाली जाती है। लेंस किस प्रकार का होगा, यह आपकी पसंद है, जो आप अपने सर्जन के साथ मिलकर तय करते हैं।
| लेंस का प्रकार | दूर (गाड़ी चलाना, टीवी) | हाथ भर की दूरी (कंप्यूटर, खाना बनाना) | पास (पढ़ना, फ़ोन) | जानने लायक बात |
|---|---|---|---|---|
| स्टैंडर्ड (मोनोफ़ोकल) | साफ़ | अक्सर साफ़ | चश्मा चाहिए | सबसे आम चुनाव। बाद में पढ़ने के लिए चश्मा। |
| टॉरिक | साफ़ | अक्सर साफ़ | चश्मा चाहिए | एस्टिग्मैटिज़्म (सिलेंडर नंबर) भी ठीक करता है, इसलिए बिना चश्मे के दूर का और साफ़ दिखता है। |
| मल्टीफ़ोकल या ट्राइफ़ोकल | साफ़ | साफ़ | साफ़ | चश्मे की ज़रूरत कम, लेकिन रात में रोशनी के चारों ओर घेरे दिखना आम है। हर आंख के लिए नहीं। |
| एक्सटेंडेड रेंज (EDOF) | साफ़ | साफ़ | अक्सर साफ़ | मल्टीफ़ोकल से कम घेरे। बारीक अक्षरों के लिए चश्मा लग सकता है। |
यह तालिका सिर्फ़ एक मोटा अंदाज़ा देती है: हर लेंस कितना अच्छा काम करेगा, यह आपकी आंख पर निर्भर करता है, और बहुत से लोग स्टैंडर्ड लेंस चुनते हैं और उससे बहुत ख़ुश रहते हैं। अपने सर्जन से इन बातों पर बात ज़रूर करें:
- आपकी रोज़ की ज़िंदगी। जो व्यक्ति घंटों पढ़ता है, रात में गाड़ी चलाता है या दिन भर स्क्रीन पर काम करता है, वह इन विकल्पों को अलग नज़र से तौल सकता है।
- एस्टिग्मैटिज़्म। अगर आपके माप में ज़्यादा एस्टिग्मैटिज़्म दिखे, तो पूछें कि क्या टॉरिक लेंस से फ़ायदा होगा।
- आंख की दूसरी बीमारियां। रेटिना की कुछ समस्याओं, ग्लूकोमा या ख़राब कॉर्निया में आम तौर पर मल्टीफ़ोकल लेंस की सलाह नहीं दी जाती, क्योंकि ये अंदर आने वाली रोशनी को बांट देते हैं।
- आपका इंश्योरेंस क्या कवर करता है। कई पॉलिसियों में मोतियाबिंद के लिए हर आंख पर एक तय सीमा होती है। प्रीमियम लेंस से बिल उस सीमा से काफ़ी ऊपर जा सकता है।
चेन्नई में मोतियाबिंद के ऑपरेशन के खर्च पर हमारी गाइड बताती है कि लेंस, ऑपरेशन का तरीका और पैकेज बिल को कैसे बदलते हैं, और एडवांस देने से पहले क्या पूछना चाहिए।
ऑपरेशन से पहले और बाद के हफ़्ते कैसे होते हैं
- पहली मुलाक़ातआंखों की जांच
डॉक्टर मोतियाबिंद की पुष्टि करते हैं, रेटिना और आंख का दबाव जांचते हैं, और बताते हैं कि आपकी नज़र कितनी बेहतर होने की संभावना है।
- ऑपरेशन की तारीख़ से पहलेमाप और जांचें
बिना दर्द वाला एक स्कैन, जिसे ए-स्कैन (A-scan) या बायोमेट्री कहते हैं, आंख को मापकर लेंस की पावर निकालता है। ब्लड शुगर और ब्लड प्रेशर जांचे जाते हैं, और आपको बताया जाता है कि रोज़ की कौन सी दवाइयां जारी रखनी हैं।
- ऑपरेशन का दिनअस्पताल में कुछ घंटे
ऑपरेशन थिएटर में लगभग 15 से 30 मिनट। आप उसी दिन आंख पर शील्ड लगाकर घर जाते हैं। घर ले जाने के लिए कोई साथ होना चाहिए।
- अगले दिन और पहले हफ़्तेजांच और ड्रॉप
पहली जांच आम तौर पर अगले दिन होती है। आप तय समय-सारिणी के हिसाब से आई ड्रॉप डालना शुरू करते हैं, आंख मलने से बचते हैं, आंख में पानी और साबुन नहीं जाने देते, और भारी सामान उठाने से बचते हैं, जैसी आपके सर्जन सलाह दें।
- चार से छह हफ़्तेआंख स्थिर
आम तौर पर ड्रॉप ख़त्म हो जाती हैं, ज़रूरत हो तो चश्मे का नंबर जांचा जाता है, और दूसरी आंख के ऑपरेशन की योजना बनाई जा सकती है।
ज़्यादातर लोगों को कुछ ही दिनों में पहले से साफ़ और चमकीला दिखने लगता है, और रंग हैरान कर देने वाले चटख लगते हैं। मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद की आई ड्रॉप पर हमारी गाइड बताती है कि हर शीशी क्या काम करती है और ड्रॉप की मात्रा धीरे-धीरे क्यों घटाई जाती है।
कब उसी दिन अस्पताल को फ़ोन करें
ऑपरेशन के बाद, अगर इनमें से कुछ भी दिखे तो तुरंत अस्पताल से संपर्क करें, रात हो तब भी:
- दर्द जो कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा हो
- नज़र जो पहले सुधर गई थी, अब बिगड़ने लगी हो
- बढ़ती लाली, सूजन, या आंख से कुछ बहना
- रोशनी की नई चमक, अचानक बहुत सारे तैरते धब्बे, या नज़र के आगे परछाईं या पर्दा सा आना
- आंख के दर्द के साथ जी मिचलाना या उल्टी
ऐसा कम ही होता है, लेकिन कुछ जटिलताओं का इलाज कुछ ही घंटों के अंदर ज़रूरी होता है, और अस्पताल हमेशा यही चाहेगा कि आप उन्हें बताएं।
अगर आप अपने लिए या अपने माता-पिता के लिए मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बारे में सोच रहे हैं, तो नीचे दिए फ़ॉर्म से आप जिन विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, उनके खर्च का एक मुफ़्त, मोटा-मोटा अनुमान पा सकते हैं।
मोतियाबिंद के ऑपरेशन का मुफ़्त अनुमान पाएं
हमें आंख के बारे में बताइए और यह भी कि भुगतान कैसे करेंगे। 92health टीम से कोई आपको फ़ोन करके आपके चुने विकल्पों के लिए खर्च का एक अंदाज़न दायरा बताएगा, और यह भी कि अस्पताल से क्या-क्या पूछना है। यह एक अनुमान है, डॉक्टरी राय नहीं: लेंस और आख़िरी दाम सर्जन आंख की जांच के बाद तय करते हैं।
धन्यवाद। आपकी जानकारी हमें मिल गई है।
92health टीम से कोई अनुमान के बारे में पर फ़ोन करेगा। आंखों की जांच की रिपोर्ट या पर्चे पास रखें: इनसे हम आपको खर्च का ज़्यादा सटीक दायरा बता पाएंगे।
आम सवाल
- क्या आई ड्रॉप या दवाइयों से मोतियाबिंद घुल सकता है?
- नहीं। किसी भी आई ड्रॉप, गोली, खान-पान या व्यायाम से बना हुआ मोतियाबिंद साफ़ हो जाता है, ऐसा आज तक साबित नहीं हुआ है, विज्ञापन चाहे कुछ भी कहें। ज़्यादा रोशनी और चश्मे का नया नंबर कुछ समय तक मदद कर सकते हैं। जब मोतियाबिंद रोज़ की ज़िंदगी में रुकावट बनने लगे, तो ऑपरेशन ही एकमात्र इलाज है।
- क्या ऑपरेशन से पहले मोतियाबिंद के पकने का इंतज़ार करना चाहिए?
- नहीं। यह सलाह पुराने तरीकों के ज़माने की है। आज सही समय वह है जब मोतियाबिंद की वजह से पढ़ने, काम करने, गाड़ी चलाने या सुरक्षित रूप से चलने-फिरने में मुश्किल होने लगे। लेंस के सख़्त और सफ़ेद होने तक रुकने से ऑपरेशन ज़्यादा कठिन हो जाता है और ठीक होने में ज़्यादा समय लगता है, और बहुत बढ़ा हुआ मोतियाबिंद आंख के अंदर दूसरी समस्याएं भी पैदा कर सकता है।
- क्या मोतियाबिंद के ऑपरेशन में दर्द होता है?
- ज़्यादातर लोगों को दर्द नहीं होता, बल्कि दबाव महसूस होता है और तेज़ रोशनी दिखती है। आंख को ड्रॉप से या आंख के आसपास एक छोटे इंजेक्शन से सुन्न किया जाता है, और आप जागते रहते हैं। ऑपरेशन के बाद कुछ दिनों तक आंख में किरकिरापन लग सकता है या पानी आ सकता है, और इसमें दी गई ड्रॉप से आराम मिलता है।
- मोतियाबिंद के ऑपरेशन में कितना समय लगता है, और क्या अस्पताल में रुकना पड़ता है?
- सिर्फ़ ऑपरेशन में आम तौर पर 15 से 30 मिनट लगते हैं। पहले और बाद की जांच के लिए अस्पताल में कुछ घंटे लगते हैं, और ज़्यादातर लोग उसी दिन घर चले जाते हैं, आंख पर एक शील्ड (सुरक्षा कवच) और ड्रॉप डालने की समय-सारिणी के साथ।
- क्या ऑपरेशन के बाद मोतियाबिंद दोबारा हो सकता है?
- धुंधला लेंस निकाल दिया जाता है, इसलिए मोतियाबिंद खुद दोबारा नहीं हो सकता। कुछ लोगों में नए लेंस को थामने वाली पतली झिल्ली (कैप्सूल) महीनों या सालों बाद धुंधली हो जाती है, जिससे लगता है जैसे मोतियाबिंद लौट आया हो। इसका इलाज क्लिनिक में ही जल्दी हो जाने वाले लेज़र से होता है, दूसरे ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं पड़ती।
- क्या मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद चश्मा लगाना पड़ेगा?
- यह लेंस पर निर्भर करता है। स्टैंडर्ड लेंस के साथ ज़्यादातर लोगों को दूर का अच्छा दिखता है और पढ़ने के लिए चश्मा चाहिए होता है। टॉरिक लेंस एस्टिग्मैटिज़्म (सिलेंडर नंबर) को भी ठीक करते हैं। मल्टीफ़ोकल और एक्सटेंडेड-रेंज लेंस एक से ज़्यादा दूरी पर चश्मे की ज़रूरत कम करते हैं, लेकिन ये हर आंख के लिए सही नहीं होते।
- क्या दोनों आंखों का ऑपरेशन एक ही दिन होता है?
- आम तौर पर नहीं। ज़्यादातर सर्जन पहले एक आंख का ऑपरेशन करते हैं और दूसरी का कुछ हफ़्ते बाद, जब पहली आंख ठीक हो जाए और उसके नतीजे से दूसरी आंख का लेंस चुनने में मदद मिल सके।
यह लेख भारत के पाठकों के लिए स्वास्थ्य से जुड़ी सामान्य जानकारी है। यह कोई निदान, दवा का पर्चा या डॉक्टर से सलाह का विकल्प नहीं है। खर्च, इलाज के तरीके और नियम हर क्लिनिक और राज्य में अलग होते हैं; जो भी बात ज़रूरी हो, उसकी पुष्टि अपने डॉक्टर या फ़ार्मासिस्ट से करें।